जो धारण करे वही धर्म , प्रेम ,क्षमा ,ज्ञान ,दौड़ना ,खेलना
जो धारण करे वही धर्म , अर्थार्थ प्रेम ,क्षमा ,ज्ञान ,दौड़ना ,खेलना जो भी कर्म हम इस क्षण कर रहे है वही हमारा धर्म जो जाता है ,मतलब हम क्रोध करते है तो उस वक़्त वही धर्म है , धर्म लगातार बदलता रहता है जरुरत के अनुसार ,जैसे में सुबह उठकर साईकल चलता हु ,दौड़ता हु व्यायाम करता हु तो वही मेरा उस वक़्त का धर्म है ,इसलिये हमे कोशिश करते रहना चाहिए हम जो भी करे उससे प्रेम बढे , शरीर और दिमाग स्वस्थ रहे ,किसी की मदद कर सकते है तो जरूर करे और सच्चे धर्म को आगे बढ़ाये।
धर्म की परिभाषा हे " धारण करना "
धारण क्या करना चाहिए " जो धारण करने योग्य हो "
धारण करने योग्य क्या हे "जिससे अपना और दुसरो का शरीर और दिमाग स्वस्थ रहे "
जहा तक रही बात हिन्दू ,मुस्लिम ,ईसाई ,बौद्ध आदि धर्मो की।तो यह सभी एक सम्प्रदाय है जो एक मत को मानते है
Nice Sir you are absolutely right & truth..
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